उसे बंधन मत बनाओ
जबरदस्ती मन न होते हुए भी दिखाने के लिए
ऐसा दिखावा किस काम का
साल भर बात न करें
एक दिन आकर रक्षासूत्र बांध दें
आज किसी को फुर्सत नहीं है
कोई इंतजार भी नहीं करता किसी का
वो दिन लद गए
छुटपन की बात कुछ अलग होती है
निश्चल प्रेम होता है
सरल होता है मन
लड़ते - झगड़ते हैं
फिर एक हो जाते हैं
बड़े होने पर सब बदल जाता है
परिस्थिति वह नहीं रहती
अपना - अपना परिवार होता है
किसी की पत्नी को पसंद नहीं
बहन - बुआ का हक होता है
पर वह उसको स्वीकार नहीं
वैसे देखा जाए तो कानूनन वह एक हिस्सेदार होती है पर सब छोड़ देती है
कपड़े और कुछ पैसे में खुश हो जाती है
भाई भी बेमन से देता है
वैसे वह पैसे लेने नहीं आती
उसका भी तो खर्च होता है
किराया - भाड़ा , मिठाई- नारियल- रक्षासूत्र
इसमें हिसाब- किताब की गुंजाइश नहीं रहती
अगर उसकी हैसियत मंहगी मिठाई नहीं लेने की है तो उसका मजाक बनाया जाता है
अगर भाई की परिस्थिति अच्छी नहीं है वह भेंट नहीं दे सकता
तो उसकी भी हंसाई होती है
यह त्योहार न होकर प्रतिष्ठा का विषय बन गया है
बहन को अजीब दृष्टि से देखा जाता है
भाई भी कभी-कभार दुविधा में फंस जाता है
क्या करें
किसे खुश करें
आजकल सोशल मीडिया का जमाना है
बुआ का खूब मजाक उड़ाया जा रहा है
मीम्स बन रहे हैं
घर की बेटी को विलेन बनाया जा रहा है
लगता है कुछ हद तक सही भी है
नयी पीढ़ी असलियत पहचान रही है
वैसे देखा जाए
तो एक बहन अपने भाई का कभी बुरा नहीं सोच सकती
नोक-झोंक अलग बात है
ऐसा बंधन किस काम का
जहाँ दिल न मिले
प्रेम न हो
औपचारिकता हो
तो रहने दो
छोड़ो
सबको खुश रहने दो
मनाना है तो दिल से मनाओ
बंधन समझ कर नहीं
धागा का क्या है
वह तो टूटने ही वाला है
भावना जो छिपी है उसमें
उसका आदर - सम्मान हो
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