मैं औरत हूँ
मैं बेटी हूँ
मैं बहन हूँ
मैं बहू हूँ
मैं पत्नी हूँ
मैं माँ हूँ
इसीलिए सारे समाज का ठेका मैंने ले रखा है
उनके इज्जदार होने का कारण मैं हूँ
यह दीगर बात है मेरा कोई इज्जत- सम्मान नहीं
हर बात पर दबाना
ताने मारना
स्वाभिमान को कुचलना
मन को आहत करना
फिर कहना कि बहुत मजबूत है
घर का दारोमदार मुझ पर
जो कहीं मेरा घर है ही नहीं
निकलने की और निकालने की धमकी बात- बात में
घर जो मेरा नहीं
वह मेरे न रहने पर बिखर जाएंगा
क्या त्याग का चोला पहना कर रख दिया है
सब काम करने पर भी सुनना
करना ही क्या है
आदर - सम्मान मिल भी गया तो
वह एहसान है एक तरह
हम ऐसे नहीं होते तब पता चलता
हमेशा से यही हुआ है
होता भी रहेगा
कहने को शिक्षा - स्वतंत्रता
पर एक आदर - सम्मान- प्यार के लिए तरसती
ममता और प्यार लुटाने वाली
उसी के लिए न जाने क्या-कुछ सहती
समानता का दिखावा सब ढकोसला
आत्मनिर्भर या फिर किसी पर निर्भर
कुछ नहीं पड़ता फर्क
बदलाव की आंधी तो कुछ ज्यादा ही उड़ा रही है
न इधर कई न उधर की
घड़ी के पैंडलुम की तरह डोलती जिंदगी
कहते हैं जमाना बदल गया
कुछ नहीं बदला है
औरत आज भी वहीं कई वहीं खड़ी है
जहाँ सदियों पहले खड़ी थी
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