Saturday, 29 August 2026

ऐ मेरी सरकार

सबके जीवन में खुशियाँ 
कोई न हो उदास
तुम भी खुश 
हम भी खुश 
यह इतना आसान नहीं 
खुश रहना और रहने देना 
बड़ा ही मुश्किल 
भूल जाता है व्यक्ति 
जहाँ दुख - परेशानी 
समस्या तो वहीं 
सारा समाज जब समानता पर हो
किसी के साथ भेदभाव न हो 
जाति - धर्म- पैसा - ज्ञान 
इन पर किसी प्रकार दवाब न हो 
सबको जीने का हक हो 
स्वतंत्रता हो 
अनुशासन हो 
मानवता हो 
किसी से तुलना न हो 
ऐसी समाज की रचना हो 
वहाँ अपराध कैसे पनपेगा??
न किसी पर दवाब 
सबको मिले रोजगार 
खत्म हो भ्रष्टाचार 
सबको जीने का अधिकार 
यही तो चाहती है यह जनता 
तुमसे सरकार 

Friday, 28 August 2026

सृष्टि का निर्माण अनवरत

पेड़ वही रह जाते हैं 
पंछी उड़ जाते हैं 
आंधी-तूफान का सामना करता 
धूप की तपन सहता 
फिर भी तन कर रहता खड़ा 
फल देता 
फूल देता 
छांव देता 
आश्रय देता 
तब भी उसे छोड़कर जाना ही है 
वह कुछ नहीं कर पाता 
बस देखता रह जाता है 
अब वह भी पहले जैसा नहीं रहा 
सूख रहा है 
उम्र हो रही है 
ठूंठ बन रहा है 
एक दिन वह कट जाएगा 
सब उसे लाद ले जाएंगे 
जला देगे 
राख बन जाएगा 
मिट्टी में मिल जाएगा 
जहाँ जन्म वहीं अंत 
यही सृष्टि का क्रम 
वहाँ फिर नया सृजन 
पहले वाला सब भूला दिया जाएगा 
नयी शुरूआत 
नया जीवन 
एक अध्याय बंद दूसरा शुरू 
रुकेगा कुछ भी नहीं 
किसी के लिए भी नहीं 

यह रक्षाबंधन

कहने को तो है धागा 
करता है कमाल 
भूले हुए को याद दिलाता 
भाई-बहन को पास लाता 
गिला - शिकवा भुलाकर 
एक - दूसरे को पास लाता 
कोई हमारा जन्मजात साथी है 
जो सबसे प्यारा सबसे न्यारा 
वह मां जाया है 
रक्त बंधन से बंधा है 
ईश्वर की इच्छा से 
स्वयं का कुछ नहीं 
तोड़ा तो जा ही नहीं सकता 
खुशियों को घर में लाता 
इसी बहाने तो बचपन भी चुपके से दस्तक दे देता 
भूली - बिसरी बातें याद कराने को 
मन में प्रेम का हिलोरे रे 
यह रक्षाबंधन का त्योहार आता 

रक्षाबंधन को बंधन मत बनाओ

प्रेम को प्रेम ही रहने दो 
उसे बंधन मत बनाओ 
जबरदस्ती मन न होते हुए भी दिखाने के लिए 
ऐसा दिखावा किस काम का 
साल भर बात न करें 
एक दिन आकर रक्षासूत्र बांध दें 
आज किसी को फुर्सत नहीं है 
कोई इंतजार भी नहीं करता किसी का 
वो दिन लद गए 
छुटपन की बात कुछ अलग होती है 
निश्चल प्रेम होता है 
सरल होता है मन 
लड़ते - झगड़ते हैं 
फिर एक हो जाते हैं 
बड़े होने पर सब बदल जाता है 
परिस्थिति वह नहीं रहती 
अपना - अपना परिवार होता है 
किसी की पत्नी को पसंद नहीं 
बहन - बुआ का हक होता है 
पर वह उसको स्वीकार नहीं 
वैसे देखा जाए तो कानूनन वह एक हिस्सेदार होती है पर सब छोड़ देती है 
कपड़े और कुछ पैसे में खुश हो जाती है 
भाई भी बेमन से देता है 
वैसे वह पैसे लेने नहीं आती 
उसका भी तो खर्च होता है 
किराया - भाड़ा , मिठाई- नारियल- रक्षासूत्र 
इसमें हिसाब- किताब की गुंजाइश नहीं रहती 
अगर उसकी हैसियत मंहगी मिठाई नहीं लेने की है तो उसका मजाक बनाया जाता है 
अगर भाई की परिस्थिति अच्छी नहीं है वह भेंट नहीं दे सकता 
तो उसकी भी हंसाई होती है 
यह त्योहार न होकर प्रतिष्ठा का विषय बन गया है 
बहन को अजीब दृष्टि से देखा जाता है 
भाई भी कभी-कभार दुविधा में फंस जाता है 
क्या करें 
किसे खुश करें 
आजकल सोशल मीडिया का जमाना है 
बुआ का खूब मजाक उड़ाया जा रहा है 
मीम्स बन रहे हैं 
घर की बेटी को विलेन बनाया जा रहा है 
लगता है कुछ हद तक सही भी है 
नयी पीढ़ी असलियत पहचान रही है 
वैसे देखा जाए 
तो एक बहन अपने भाई का कभी बुरा नहीं सोच सकती 
नोक-झोंक अलग बात है 
ऐसा बंधन किस काम का 
जहाँ दिल न मिले 
प्रेम न हो 
औपचारिकता हो 
तो रहने दो 
छोड़ो 
सबको खुश रहने दो 
मनाना है तो दिल से मनाओ 
बंधन समझ कर नहीं 
धागा का क्या है 
वह तो टूटने ही वाला है 
भावना जो छिपी है उसमें 
उसका आदर - सम्मान हो