खास बात नहीं समझ पाए
कुछ बहुत अपने होते हैं
फर्क इतना कि
उनसे अपने मन की बात नहीं कह पाते
कहने जाए तो सुनना भी नहीं चाहते
उनके लिए यह सामान्य सी बात है
सबकी परिस्थिति एक सी होती नहीं
यह बात हमको भी पता है
हंसो - खिलखिलाओ
पार्टी मनाओ
इससे खुशी नहीं मिलती
चार घड़ी बैठ कर बात करने का
सुख - दुख बांटने का समय नहीं
उस झूठमूठ की हंसी में रूदन अंदर ही अंदर टीसता रहता है
कब तक बनावटी रहेंगे
मन की भावना चेहरे पर आ ही जाती है
तब सब फिजूल लगता है
मन खुश तो सब खुश
मन नहीं खुश तो सब फीका
स्वयं खुश रहें तभी दूसरों की खुशी भी भाती है
क्या गम है तुम्हें
इसकी किसी को क्या खबर
सब अपनी खबर बताने में मशगूल
किसी को क्या पड़ी
तुम्हारी खैरियत की
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